
रतलाम, 1जून (खबरबाबा.काम)। सिविक सेंटर प्लाटों की रजिस्ट्री के मामले में सूचना के अधिकार में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है।सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी में सामने आया है कि कम दरों पर बेचे जाने के बाद घाटा खाकर रजिस्ट्री कराने के लिए नगर निगम से ही वर्ष 2008 में शासन से नियमों को शिथिल कर आदेश देने की मांग की गई थी। निगम के पत्र पर सितंबर 2008 में हुई राज्य शासन की कैबिनेट बैठक में इसे स्वीकृति दी गई थी।
ज्ञातव्य है कि सिविक सेंटर के प्लाटों की पुरानी दरों पर रिजस्ट्री होने पर हंगामा मचा हुआ है। निगम परिषद में रजिस्ट्री को शून्य करने की कार्रवाई करने का प्रस्ताव भी पारित किया जा चुका है। लेकिन अब सूचना का अधिकार में जानकारी सामने आई है कि वर्ष 2008 में नगर निगम ने खुद ही सिविक सेंटर सहित नौ योजनाओं के प्लाट घाटे में बेचने की अनुमति कैबिनेट से मांगी थी। तत्कालिन केबिनेट ने इसपर फैसला भी दिया था।
वर्तमान की बात करें तो यह मामला फिलहाल हाईकोर्ट में है। बताया जा रहा है कि अगली सुनवाई में निगम की ओर से दिए जाने वाले जवाब से प्रकरण की दिशा तय हो सकती है।
यह जानकारी आई सामने
सूचना का अधिकार में सामने आया है कि नगर निगम ने न केवल सिविक सेंटर बल्कि तत्कालीन नगर सुधार न्यास की कई योजनाओं में प्लाट नियम विपरीत बेच दिए थे। ऐसे करीब 1500 प्लाट हैं जिनके लिए यह अनुमति मांगी गई थी। 1 अगस्त 1994 को नगर सुधार न्याय का विलय नगर निगम में कर दिया गया था। विलय के बाद न्यास के व्यावसायिक व आवासीय भूखंडों का विक्रय नगर निगम के तत्कालीन अधिकारियों, पदाधिकारियों द्वारा मप्र नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 80 के अंतर्गत बनाए गए नगर पालिक निगम नियम 1994 के प्रावधान अनुसार किए जाने थे। लेकिन नगर सुधार न्यास अधिनियम 1960 के नियमों के अनुसार पहले आओ-पहले पाओ पद्धति पर पूर्णतया विक्रित मूल्य व लीज पर संपत्तियां बेच दी गई और कुछ की रजिस्ट्री भी करा दी गई।
नियम विपरीत संपत्ति बेचे जाने के बाद विसंगति के चलते प्लाटों की रजिस्ट्रियां रूक गई। इससे विवाद की स्थिति बनी तो 21 जुलाई 2008 को तत्कालीन आयुक्त द्वारा नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिख नगर सुधार न्यास की आवंटित संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने व शेष संपत्तियों के आवंटन की स्वीकृति मांगी गई। निगम के पत्र के बाद इस मामले को कैबिनेट में रखने से पहले विधि विभाग, वित्त विभाग की राय भी ली गई। इसमें विधि विभाग ने उल्लेख किया कि नियमों के अंतर से घोष विक्रय के अभाव में यदि संपत्ति का उचित मूल्य नगर पालिक निगम को नहीं मिल सका है तो जबकि वह घाटा सहन करने को तैयार है तो उसे ऐसी अनुमति दी जा सकती है। क्योंकि नियमों में परिवर्तन का अधिकार राज्य शासन को है।
शर्तों के साथ मिली थी अनुमति
इसके बाद 30 सितंबर 2008 को हुई कैबिनेट की बैठक के आयटम नंबर 21 पर इसे स्वीकृति देकर निर्णय लिया गया था। इसमें कि नगर सुधार न्यास रतलाम द्वारा पूर्व में निर्मित संपत्ति के विक्रय की कार्योत्तर स्वीकृति नगर निगम को दी जाए। विक्रय योग्य शेष संपत्ति को नगर निगम द्वारा मप्र नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 में वर्णित प्रावधान अनुसार विक्रय की अनुमति दी गई थी। लेकिन इसमें शर्तें शामिल थी कि विक्रय से प्राप्त राशि केवल हुड़कों से लिए गए ऋण को चुकाने में व्यय की जाएगी। संपत्ति के मूल्य में हुई कमी की प्रतिपूर्ति राज्य शासन द्वारा नहीं की जाएगी। इस निर्णय के बाद 31 अक्टूबर 2008 को नगरीय प्रशासन विभाग के तत्कालीन उप सचिव एसके उपाध्याय ने नगर निगम आयुक्त रतलाम को राज्य शासन द्वारा दी गई अनुमति का आदेश जारी किया। अब राज्य शासन का विस्तृत आदेश सामने आने के बाद निगम प्रशासन को कानूनी पहलू को लेकर मशक्कत करना पड़ सकती है।
आदेश के बाद शुरू हुई रजिस्ट्री
राज्य शासन के आदेश के बाद विकास शाखा की नौ योजनाओं में प्लाटों की रजिस्ट्री लगातार होती रही। इस दौरान महापौर परिषद, निगम परिषद से इसकी कोई अनुमति या जानकारी भी नहीं दी गई। इसकी वजह यह रही कि राज्य शासन के निर्णय के बाद स्थानीय स्तर पर अनुमति लेना जरूरी नहीं हो जाता।
इन योजनाओं के प्लाटों की रजिस्ट्री के लिए मांगी थी अनुमति
राजीव गांधी सिविक सेंटर के 36 भूखंड, 132 भवन,
पंडित प्रेमनाथ डोंगरे नगर के 558 भवन व 56 भूखंड,
मुखर्जी नगर के 133 भवन व 2 भूखंड, देवरा देवनारायण नगर के 18 भवन व 5 भूखंड,इंद्रानगर पूर्व के 6 भूखंड,कस्तूरबा नगर के 4 भूखंड,कलीमी कालोनी के 01 भूखंडअर्जुन नगर के 19 भवन,अमृत सागर के 32 भवन।



