57 लाख का पेंचवर्क और 17 लाख की चूरी फिर भी सड़क के गढ्ढो से मुक्ति नही

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रतलाम(राजेश जैन)(खबरबाबा.काम)। शहर की सड़के बदहाल हो चुकी है । यह तय कर पाना मुशिकल है , कि सड़को में गढ्ढे है , या गढ्ढो में सड़क है । नगर निगम ने पेंचवर्क के नाम पर 57 लाख रुपये था गढ्ढो को समतल करने के लिये 17 लाख रुपये खर्च कर दिये है । 74 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी स्तिथी वैसी ही बनी हुई है ।पेंचवर्क के नाम पर लीपा पोती की गई और चूरी कही नज़र नही आ रही है और नगर सरकार पेंचवर्क तथा चूरी के नाम पर अपना काम गिना रही है । जरा सोचिए जिला न्यायालय , जिलाधीश कार्यलय , जिला पुलिस अधीक्षक कार्यलय , जिला पंचायत , जनपद पंचायत , सहित अन्य शासकीय कार्यलयों तक पहुचने के पहले चार पहिया वाहनो , दुपहिया वाहनो यहां तक की पैदल चलने वालों को भी दो फलांग तक पहुँचने में पसीना आ जाए तो वह मार्ग कितना बदहाल होगा यह समझा जा सकता है । ऐसा नही है कि एक तरफ से ही मार्ग की हालत इतनी खराब है बल्कि गीता मंदिर रोड़ से आने वाले  मार्ग की हालत भी ठीक ऐसी ही है , जैसी छत्रीपुल मार्ग से कोर्ट तिराहे पर जाने वाले मार्ग की । इन मार्गो से प्रतिदिन अधिकारी एवं वी आई पी निकलते है । इन्दौर रैफर किये गए मरीजो की एम्बुलेंस निकलती है , लेकिन निगम प्रशासन पेंचवर्क के नाम पर मुहर्रम एवं गिट्टी डाल कर अपनी जबाव दारी पूर्ण समझ बैठा है । पेचवर्क के नाम पर चूरी डालना भी बताया लेकिन पूरे मार्ग में चूरी कही नजर नही आती । सवाल पूछने पर कहते है , कि चूरी बारिश में बह गयी होगी । निगम में  इंजीनियरों की फौज है लेकिन गढ्ढो में चूरी किन मापदंडों के तहत डालनी है , इसके तकनीकि ज्ञान का उपयोग क्यों नही किया गया ? इसका जबाव किसी के पास नही ? गढ्ढो को केवल चूरी डाल कर पाट दिया गया । उन गढ्ढो में चूरी कैसे टिकेगी , इस तकनीक का उपयोग कही नही किया गया । ये तो ठीक है , लेकिन चूरी के नाम पर जो ड्रामा हुआ वह तो और भी आश्चर्य चकित करने वाला है । पार्षदो पर अविश्वास के चलते पहले तो चूरी पंजरा पोल में एकत्रित करवाई गई और वहां से वार्डो में ट्रालियों से चूरी भेजी गई । यानी की चूरी डालने के नाम पर परिवहन का दुगुना आर्थिक भार नगर निगम को वहन करना पड़ा । पंजरा पोल से चूरी डम्प करवाने के बाद भी हालात यह थे की कई वार्ड पार्षद अपने वार्डो में चूरी नही पहुँचने की शिकायत करते रहे । ओर ऐसे कई वार्ड है , जहाँ चूरी की जरूरत नही थी वहाँ चूरी पहुँच गई । इसका कारण जब सामने आया तो पता चला कि कुछ पार्षदो ने पंजरपोल पर ही अपनी बैठक जमा ली थी और वे ही अपनी मर्जी अनुसार चूरी की ट्रेलिया वार्डो में भेज रहे थे । फ़िलहाल चूरी का 17 लाख रुपये का बिल नगर निगम में पेश हो गया है । कितने डम्फर चूरी आयी किसने एंट्री की ? यदि एंट्री हुई है तो वह कितनी सही है यह भी एक सवाल उठ खड़ा हुआ है । कुल मिलाकर पेंचवर्क ओर चूरी के नाम पर क्या खेल खेला गया है यह तो समझने वाले ही जाने लेकिन शहर की जनता को 74 लाख खर्च होने के बाद भी गढ्ढो से मुक्ति नही मिल पाई है ..?

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